Sad demise

इनकी मौत ज्यादा तकलीफदेह है। रोज रोज होती मौतें अभ्यस्त सा कर चुकी हैं। यहां मौतों के ही बादल मंडराते और बरसते रहते हैं। ऐसे में किसी को मौत के चंगुल से छुड़ा कर सहज जीवन की पटरी पर लाने में जीव आश्रय अपनी भूमिका को ले कर गदगद होता है। खुशी का यही एक रास्ता है।कभी कभी जीवन की पटरी पर चल डगरने वाला जब फिर मौत की बांहों में समा जाता है तो आंखें डबडबा ही जाती हैं। यह बछड़ा कोई छः माह पहले अस्थियों के ढांचे सा जीव आश्रय लाया गया था। उठाने से उठता था। उपचार हुआ। दाना पानी मिला और वो स्वस्थ हो गए। चरही में घुस कर खाना अच्छा लगने लगा। एक सुबह वो ऐसे बैठे मिले कि उठाने से भी नही उठ सके। पता चला रीढ़ की हड्डी से कोई दिक्कत हो गई। शायद किसी अन्य जानवर ने मारा था। कोई 20 दिन पहले इस दशा में पहुंचा यह बछड़ा दिन पर दिन दैन्य होता गया। दोपहर में केले खाये थे। लेकिन हम सब प्रार्थना कर रहे थे। अभी शाम उन्हें देख कर पता चला प्रार्थना स्वीकार हो गई। आंखे भर आईं और उनके शव को अपने बच्चे की तरह उठा कर किनारे रखा। सुबह मुश्ताक भाई को सौंप देने की खातिर…..

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